Tuesday, November 16, 2021

मनुर्भरत

 मनुर्भरत

हमारे पाश्चात्य गुरुओं ने हमें बचपन में पढ़ाया था कि आर्य लोग खानाबदोश गड़रियों की भाँति भद्दे छकड़ों में अपने जंगली परिवारों और पशुओं को लिए इधर से उधर भटकते फिरा करते थे। अब मैं इन सब पुरातत्त्ववेत्ताओं की इन गवेषणाओं पर हर्फ मारने की धृष्टता करता हूं। जिन सूत्रों को हाथ में लेकर मैं आगे बढ़ना चाहता हूं, उनमें इन पाश्चात्य विद्वानों के वर्णित स्थान सुषा, एलम, सप्तसिन्धु, प्रलय, और इन प्रदेशों में जातियों के आवागमन की मान्यताओं के अतिरिक्त ऋग्वेद, ब्राह्मण, विष्णु-पुराण, मत्स्यपुराण तथा अन्य पुराणों के अस्तव्यस्त-अव्यवस्थित वर्णन हैं। इन्हीं सूत्रों पर मैं इस प्रागैतिहासिक काल के कुछ धुंधले रेखाचित्र यहाँ उपस्थित करता हूँ। मैं इन आगत आक्रान्ता-समागत जनों के नाम-धाम-जाति तथा उनके और भी महत्त्वपूर्ण विवरण यहाँ उपस्थित करूँगा, जिनके मूल वक्तव्य पुराणों आदि में हैं, और जिनका समर्थन पर्शिया, अरब, अफ्रीका, मिन और अरब तथा मध्य एशिया के प्राचीन इतिहासों से होता है।

सबसे पहले मैं समय-निरूपण के सम्बन्ध में यह कहना चाहता हूँ कि पुराणों में प्राचीन समय का विभाग मन्वन्तरों की गणना के अनुसार किया गया है। मन्वन्तर को छोड़कर अतीत काल की स्थिति जानने का कोई और उपाय नहीं है। मन्वन्तर को छोड़कर अतीत काल की स्थिति जानने का कोई और उपाय नहीं है। परन्तु पुराणों में यह काल-गणना इतनी बढ़ा-चढ़ाकर की गई है कि उनकी वर्णित काल-गणना बेकार ही है। परन्तु मन्वन्तरों के कथन से हमें यह लाभ अवश्य हुआ कि वैवस्वत मनु से पहले छः मन्वन्तर मिलते हैं। इतने ही आधार को लेकर, जिसमें जो घटनाएँ वर्णित हैं, उनका पूर्वापर सम्बन्ध मिलाकर मैं उसी के आधार पर यह काल-गणना कर रहा हूं।


ईसा से कोई चार हज़ार वर्ष पूर्व भारतवर्ष के मूल पुरुष स्वायंभुव मनु उत्पन्न हुए। इनकी तीन पुत्रियां तथा दो पुत्र हुए। पुत्रों के नाम प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। प्रियव्रत के दस पुत्र हुए। इन्हें प्रियव्रत ने पृथ्वी बाँट दी। ज्येष्ठ पुत्र अग्नीध्र को उसने जम्बूद्वीप (एशिया) दिया। इसे उसने अपने नौ पुत्रों में बांट दिया। बड़े पुत्र नाभि को हिमवर्ष-हिमालय से अरब समुद्र तक देश मिला। नाभि के पुत्र महाज्ञानी-सर्वत्यागी ऋषभदेव हुए। ऋषभदेव के पुत्र महाप्रतापी भरत हुए-जिन्होंने अष्टद्वीप जय किए और अपने राज्य को नौ भागों इसके अनन्तर इस प्रियव्रत शाखा में पैंतीस प्रजापति और चार मनु हुए। चारों मनुओं के नाम स्वारोचिष, उत्तम, तामस और रैवत थे। इन मनुओं के राज्यकाल को मन्वन्तर माना गया। चाक्षुष रैवत मन्वन्तर की समाप्ति पर छत्तीसवां प्रजापति और छठा मनु, स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र उत्तानपाद की शाखा में चाक्षुष नाम से हुआ। इस शाखा में ध्रुव, चाक्षुष मनु, वेन, पृथु, प्रचेतस आदि प्रसिद्ध प्रजापति हुए। इसी चाक्षुष मन्वन्तर में बड़ी-बड़ी घटनाएँ हुई। भरत वंश का विस्तार हुआ। राजा की मर्यादा स्थापित हुई। वेदोदय हुआ।


इस वंश का प्रथम राजा वेन था। इस वंश का पृथु वैन्य प्रथम वेदर्षि था। उसने सबसे प्रथम वैदिक मन्त्र रचे। अगम भूमि को समतल किया गया। उसमें बीज बोया गया। इसी के नाम पर भूमि का पृथ्वी नाम विख्यात हुआ। इसी वंश के राजा प्रचेतस ने बहुत-से जंगलों को जलाकर उन्हें खेती के योग्य बनाया। जंगल साफ कर नई भूमि निकाली .कृषि का विकास किया। इन छहों मनुओं के काल का समय-जो लगभग तेरह सौ वर्ष का काल है-सतयुग के नाम से प्रसिद्ध है। मन्वन्तर-काल में वह प्रसिद्ध प्रलय हुई जबकि काश्यप सागर तट की सारी पृथ्वी जल में डूब गई। केवल मनु अपने कुछ परिजनों के साथ जीवित बचा।

सतयुग को ऐतिहासिक दृष्टि से दो भागों में विभक्त किया जाता है-एक प्रियव्रत शाखा-काल, जिसमें पैंतीस प्रजापति और पाँच मनु हुए। दूसरा उत्तानपाद शाखा-काल, जिसमें चाक्षुष मन्वन्तर में दस प्रजापति और राजा हुए।

सांस्कृतिक दृष्टि से भी इस काल के दो भाग किए जाते हैं। एक प्राग्वेद काल-उन्तालीसवें प्रजापति तक; दूसरा वेदोदय काल-इसके बाद। भूमि का बंटवारा, महाजलप्रलय, वैकुण्ड का निर्माण, भूसंस्कार, कृषि, राज्य-स्थापना वेदोदय तथा भारत और पर्शिया में भरतों की विजय इस काल की बड़ी-बड़ी सांस्कृतिक और राजनीतिक घटनाएं हैं। वेदोदय चाक्षुष मन्वन्तर की सबसे बड़ी सांस्कृतिक घटना है। सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटना पर्शिया पर आक्रमण भी इसी युग की है।

चाक्षुष मनु के पांच पुत्र थे। अत्यराति, जानन्तपति, अभिमन्यु उर, पुर और तपोरत। उर के द्वितीय पुत्र अंगिरा थे। इन छहों वीरों ने पर्शिया पर आक्रमण किया था। उस काल में पर्शिया का साम्राज्य चार खण्डों में विभक्त था, जिनके नाम सुग्द, मरु, वरवधी और निशा थे। पीछे हरयू (हिरात) और वक्रित (काबुल) भी इसी राज्य में मिल गए थे। यहाँ पर प्रियव्रत शाखा के स्वारोचिष मनु के वंशज राज्य कर रहे थे। जानन्तपति महाराज अत्यराति चक्रवर्ती कहे जाते थे। आसमुद्र क्षितीश थे। भारतवर्ष की सीमा के अन्तिम प्रदेश और पर्शिया का पूर्वी प्रान्त जो सत्यगिदी के नाम से विख्यात है, उस समय सत्यलोक कहाता था। उसी के सामने सुमेरु के निकट वैकुण्ठधाम था, जो देमाबन्द-एलबुर्ज पर्वत पर अभी तक 'इरानियन पराडाइस' के नाम से प्रसिद्ध है। देमाबन्द तपोरिया प्रान्त में है। इसी प्रान्त के तपसी विकुण्ठा और उसके पुत्र वैकुण्ठ थे। वैकुण्ठधाम उन्हीं की राजधानी थी। चक्रवर्ती महाराज अन्यराति जानन्तपति के दूसरे भाई का नाम मन्यु या अभिमन्यु था। प्राचीन पर्शियन इतिहास में उन्हें मैन्यु और ग्रीक में 'मैमनन' कहा गया है। अर्जनेम में अभिमन्यु (Aphumon) दुर्ग के निर्माता तथा ट्राय-युद्ध के विजेता यही अभिमन्यु हैं।

प्रसिद्ध पुराण-काव्य ‘ओडेसी' में इन्हीं अभिमन्यु महाराज की प्रशस्ति वर्णन की गई है। इन्होंने ही सुषा नाम की नगरी बसाई, जो सारे संसार में प्राचीनतम नगरी थी। इसका नाम मन्युपुरी था। अत्यराति के तृतीय भाई उर थे। इन्होंने अफ्रीका, सीरिया, बैबीलोनिया आदि देशों को जीता और ईसा से 2000 वर्ष पूर्व इन्हीं के वंशधरों ने अब्राहम को पददलित कर पूर्वी मिस्र में अपना राज्य स्थापित किया। इस कथा का संकेत ईसाइयों के पुराने अहदनामे में मिलता है। आज भी उर बैबीलोनिया का एक प्रदेश है। प्रसिद्ध उर्वशी अप्सरा इसी उर प्रदेश की थी। ईरान के एक पर्वत का नाम भी उरल है। उरफाउरगंज नगर है। उसका उरखेगल प्रदेश है। उरमिया प्रदेश भी है, जहां जोरास्टर का जन्म हुआ था। अफ्रीका में भी एक प्रान्त रायो-डि-ओरो है। उर-वंशियों के ईरान में-उर, पुर और वन-ये तीन राज्य स्थापित हुए।

उर के दूसरे भाई पुर थे। अब भी एलबुर्ज के निकट इनकी राजधानी पुरसिया है। इन्हीं के नाम पर ईरान का नाम पर्शिया पड़ा। पुर और उर के भाई तपोरत थे। इन्होंने 'तपोरत' नाम से अपना राज्य स्थापित किया जो अब तपोरिया प्रान्त कहाता है। वहां के निवासी अब तपोरत कहाते हैं। इस प्रदेश में वैकुण्ठ है, जो देमाबन्द पर्वत पर है। तपसी वैकुण्ठधाम थी। तपोरत के राजा आगे देमाबन्द कहाने लगे, जिन्हें हम देवराज कहते हैं। आजकल इस तपोरिया भूमि को मजांदिरन कहते हैं। जानन्तपति अत्यराति के वंशज अर्राट हैं। आरमेनिया इनका प्रान्त है। अर्राटों ने आगे असुरों से भारी-भारी युद्ध किए हैं। अर्राट पर्वत भी अत्यराति के नाम पर ही है। सीरिया का नागर अत्यरात (Adhrot) भी इन्हीं के नाम पर है। उर के पुत्र अंगिरा थे, जिन्होंने अफ्रीका को जय किया। अंगिरा-पिक्यूना के निर्माता और विजेता यही थे। अंगिरा और मन्यु की विजयों-युद्धों और अभियानों-के वर्णनों से ईरानी-हिब्रू धर्मग्रन्थ भरे पड़े हैं।

इन छहों भरतों ने ईरान पर इतना उग्र आक्रमण किया था कि वहां के सब जन और शासक उनसे अभिभूत हो गए। उनके सर्वग्राही और भयानक आक्रमण से पददलित होकर वे उन्हें अहित देव-दुःखदायी अहरिमन और शैतान कहकर पुकारने लगे। अवेस्ता में अंगिरामन्यु-अहरिमन कहा गया है। बाइबिल में उन्हें शैतान कहा गया है। मिल्टन के 'स्वर्ग-नाश' की कथा में इसी विजेता को शैतान कहा गया है। पाश्चात्य देशों के पुराण-इतिहास इन्हीं छह विजेताओं की दिग्विजय के वर्णनों से भरे हुए हैं। पाश्चात्य पुराण-साहित्य में इन्हें विकराल देव और सैटानिक होस्ट का अधिनायक कहा गया है।  

ये छहों अमर अनहितदेव की भांति ईरान के प्राचीन उपास्यदेव हो गए थे। इन्हीं की विजय-गाथा मिल्टन ने चालीस वर्ष तक गाई है। पाश्चात्य इतिहास-वेत्ता इस आक्रमण का काल ईसा से तेईस सौ वर्ष पूर्व बताते हैं। हमारा अनुमान है कि प्रलय के वर्ष पूर्व चाक्षुषों का यह आक्रमण ईरान के निवासी अपने ही भाईबन्धुओं पर हुआ था और इनके वंशधर वहीं बस गए थे। यही कारण है कि भारतीय पुराणों में इनके पूर्वजों का वंशवृक्ष तो है परन्तु इनके वंशजो का वंश विस्तार नही है । इनके वंश इन विजित उपनिवेशो के प्राचीन इतिहास में मिलता है ।

आचार्य चतुरसेन की पुस्तक वयं रक्षम: से उद्धृत

Saturday, October 30, 2021

UP climbs back to second spot in GSDP

 

Despite Covid-induced slowdown in economies across the world, Uttar Pradesh has been able to keep up with the pace to once again become the second largest state of India in terms of Gross State Domestic Product (GSDP).

The Finance department data,  reveals that the state’s GSDP in the 2020-2021 financial year has crossed ₹19.48 lakh crore, equivalent to $268 billion, and UP has climbed to the second spot from number five in 2019-2020.

Maharashtra continues to lead from the top position while UP moved up three ranks past Tamil Nadu, Gujarat and Karnataka. UP’s GSDP at ₹ 19.48 lakh crore is more than Tamil Nadu’s ₹ 19.2 lakh crore, Karnataka’s ₹ 18.03 lakh crore and Gujarat’s ₹ 17.4 lakh crore. 

Four years ago, in 2017, Uttar Pradesh's state GDP was ₹11 Lakh Crores but has doubled today. The manufacturing sector has shown significant growth. Until 2014, entire India had 2 mobile phone handset plants however today, Noida alone has 90 Mobile manufacturing plants which are nothing less of a miracle.

If Yogi successfully pulls through his ambitious Defence Industrial Corridor, it will spread growth to untouched areas of the Purvanchal & Bundelkhand region as the majority of its area is still under poverty and untouched by the benefits of a growing economy. 

Expressways like Purvanchal Expressway, Bundelkhand Express and the upcoming Ganga Expressway will move the growth to the most backward areas of Uttar Pradesh despite vast resources and a fantastic ecosystem.

Friday, October 29, 2021

Sardar Udham Singh

Just finished watching the movie of the famous revolutionary who avenged the horrific Jallianwala Bagh massacre and assassinated Michael O'Dwyer, 20 years later in England. The film portrays the most brutal and gory events in India’s history that resulted in the death of about 1,000 people and reminds us how people sacrificed to get us the freedom we enjoy.

But what is not shown in the movie is that back in India , while he was still waiting for his trial ,in March 1940, Pandit Jawahar Lal Nehru, condemned the action of Udham Singh as senseless. He was sent to gallows in July 1940 and quickly forgotten.
In 1974, Singh's remains were exhumed and repatriated to India at the request of MLA Sadhu Singh Thind. Thind accompanied the remains back to India, where the casket was received by Indira Gandhi, Shankar Dayal Sharma and Zail Singh.
Udham Singh was later cremated in his birthplace of Sunam in Punjab and his ashes were scattered in the Sutlej river. Some of his ashes were retained; these retained ashes are kept inside a sealed urn at Jallianwala Bagh.
A special thanks to Ms Mayawati, who named a district (Udham Singh Nagar) in October 1995, a long pending step to pay homage to such forgotten heroes.

नीलकण्ठ मंदिर

नीलकण्ठ मंदिर -

दो दिन पहले बाँदा जाना हुआ । वहाँ जिलाधिकारी से वार्ता के दौरान कालिंजर किले के बारे में जानकारी मिली । बाँदा जिलें में विंध्य पर्वत पर स्थित यह दुर्ग विश्व धरोहर स्थल खजुराहो से 98 किलोमीटर दूर है। इसे भारत के सबसे विशाल और अपराजेय दुर्गों में गिना जाता रहा है। इस दुर्ग में कई प्राचीन मन्दिर हैं। इनमें कई मन्दिर तीसरी से पाँचवीं सदी गुप्तकाल के हैं।


किले के पश्चिमी भाग में कालिंजर के अधिष्ठाता देवता नीलकण्ठ महादेव का एक प्राचीन मन्दिर भी स्थापित है। इस मन्दिर को जाने के लिए दो द्वारों से होकर जाते हैं। रास्ते में अनेक गुफाएँ तथा चट्टानों को काट कर बनाई शिल्पाकृतियाँ बनायी गई हैं। वास्तुशिल्प की दृष्टि से यह मंडप चंदेल शासकों की अनोखी कृति है। मन्दिर के प्रवेशद्वार पर परिमाद्र देव नामक चंदेल शासक रचित शिवस्तुति है व अंदर एक स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। मन्दिर के ऊपर ही जल का एक प्राकृतिक स्रोत है, जो कभी सूखता नहीं है। इस स्रोत से शिवलिंग का अभिषेक निरंतर प्राकृतिक तरीके से होता रहता है। बुन्देलखण्ड का यह क्षेत्र अपने सूखे के कारण भी जाना जाता है, किन्तु कितना भी सूखा पड़े, यह स्रोत कभी नहीं सूखता है।चन्देल शासकों के समय से ही यहाँ की पूजा अर्चना में लीन चन्देल राजपूत जो यहाँ पण्डित का कार्य भी करते हैं, वे बताते हैं कि शिवलिंग पर उकेरे गये भगवान शिव की मूर्ति के कण्ठ का क्षेत्र स्पर्श करने पर सदा ही मुलायम प्रतीत होता है। यह भागवत पुराण के सागर-मंथन के फलस्वरूप निकले हलाहल विष को पीकर, अपने कण्ठ में रोके रखने वाली कथा के समर्थन में साक्ष्य ही है। मान्यता है कि सागर-मन्थन से निकले कालकूट विष को पीने के बाद भगवान शिव ने यहीं तपस्या कर उसकी ज्वाला शान्त की थी। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला कार्तिक मेला यहाँ का प्रसिद्ध सांस्कृतिक उत्सव है।

यह दुर्ग एवं इसके नीचे तलहटी में बसा कस्बा, दोनों ही महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर हैं। यहाँ कई प्राचीन मन्दिरों के अवशेष, मूर्तियाँ, शिलालेख एवं गुफाएं आदि मौजूद हैं। इस दुर्ग में कोटि तीर्थ के निकट लगभग २० हजार वर्ष पुरानी शंख लिपि स्थित है जिसमें रामायण काल में वनवास के समय भगवान राम के कालिंजर आगमन का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार श्रीराम, सीता कुण्ड के पास सीता सेज में ठहरे थे।  इस दुर्ग का विवरण अनेक हिन्दु पौराणिक ग्रन्थों जैसे पद्म पुराण व वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है। इसके अलावा बुड्ढा-बुड्ढी सरोवर व नीलकंठ मन्दिर में नौवीं शताब्दी की पांडुलिपियाँ संचित हैं, जिनमें चंदेल-वंश कालीन समय का वर्णन मिलता है। शेरशाह सूरी की 1545 में इसी दुर्ग में मृत्य हुई थी । 1812 में अंग्रेजों के कब्जे के बाद दुर्ग में स्थित बहुत सी इमारतों को ध्वस्त कर दिया गया ।

पुरातत्त्व विभाग ने पूरे दुर्ग में फ़ैली, बिखरी हुई टूटी शिल्पाकृतियों व मूर्तियों को एकत्रित कर एक संग्रहालय में सुरक्षित रखा हुआ है। गुप्त काल से मध्यकालीन भारत के अनेक अभिलेख संचित हैं। इनमें शंख लिपि के तीन अभिलेख भी मिलते हैं।

Wednesday, September 8, 2021

कोविड और भारत

 पश्चिम में कोविड -19 का कहर , लेकिन भारत को इतनी कठोरता से क्यों आंका जाता है ?


पिछले महीने, जब न्यूयॉर्क को एक नया गवर्नर मिला, तो उसका पहला आदेश आधिकारिक टैली में 12,000 असूचित कोविड -19 मौतों को जोड़ना था। दुनिया के सबसे उन्नत शहर में 12,000 मौतें कैसे छोड़ी जा सकती हैं? न्यूयॉर्क टाइम्स के अभिजात वर्ग क्या कर रहे थे? शायद वे भारत के सबसे गरीब राज्यों को शर्मसार करने के मिशन पर थे। वे हमारे दुख को पूरी दुनिया के सामने दिखाने के मिशन पर थे , भारत का अभिजात्य मिडिया ड्रोन से जलती लाशो के सुंदर फोटो खींच रहा था ।

आइए पहले हम इस बात का जायजा लें कि आज संयुक्त राज्य अमेरिका में क्या हो रहा है। ये देश कोविड -19 संक्रमण की चौथी या पांचवीं लहर देख रहा है। अमेरिका में मौतों का सात दिन का मूविंग एवरेज अब 1,500 प्रति दिन से ऊपर है। जनसंख्या के हिसाब से समायोजित, जो भारत में प्रतिदिन 6,000 से अधिक मौतों के बराबर है। आँकड़ों से दूर, सामान्य अमेरिकियों के लिए मानवीय स्तर पर इसका क्या अर्थ है? अस्पताल और अंतिम संस्कार के घर शवों से पट गए हैं। कई लोगों ने शवों को सुरक्षित रखने के लिए अस्थायी शीतलन इकाइयों को किराए पर दिया है जब तक कि वे यह पता नहीं लगा लेते कि उनके साथ क्या करना है।

द न्यू यॉर्क टाइम्स और द वाशिंगटन पोस्ट जैसे प्रमुख अमेरिकी मीडिया पर, इस बारे में एकदम सन्नाटे में  है। वास्तविक रिपोर्ट लाने का काम छोटे, स्थानीय आउटलेट्स पर छोड़ दिया जाता है, जिनके पास राष्ट्रीय तस्वीर को एक साथ रखने के लिए संसाधन नहीं होते हैं। और सबसे बढ़कर, राष्ट्रपति बाइडेन के नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं है। अमेरिकी अभिजात वर्ग ने न केवल अफगानिस्तान में अपने सहयोगियों को छोड़ दिया है बल्कि उन्होंने अपनों को घर पर छोड़ दिया है।

महामारी हर देश पर भारी पड़ी है। अमेरिका ने करीब 6.5 लाख मौतें दर्ज की हैं, जो भारत में 26 लाख मौतों के बराबर होगी। अब तक, फ्रांस और यूके में 1.15 लाख मौतें और 1.33 लाख मौतें दर्ज की गई हैं। जनसंख्या के संदर्भ में उन संख्याओं को परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, यह भारत में 23-27 लाख मौतों के समान है। ये तब है जबकी  विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा फ्रांसीसी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को नंबर एक स्थान दिया गया है। 

लेकिन अप्रैल-मई में, जब भारत सबसे बुरे दौर से गुजरा, तो दुनिया को देखने के लिए अंतिम संस्कार की चिता जलाने की भयानक तस्वीरें लगाई गईं। युद्ध के समय में भी, मीडिया में निकायों पर रिपोर्टिंग करते समय सभ्य व्यवहार के मानक होते हैं। लेकिन भारत में दूसरी लहर को कवर करते समय इन सभी नियमों को काट दिया गया, ताकि "सच्चाई" को "उजागर" किया जा सके। वे वास्तव में क्या उजागर करने की कोशिश कर रहे थे? भारत के पास उतने संसाधन नहीं हैं जितने पश्चिमी देशों के पास हैं। वे  प्रति व्यक्ति आधार पर भारत से  लगभग 20 गुना अधिक समृद्ध हैं।


भारत के भीतर भी, उन्होंने अपना ध्यान सबसे गरीब, सबसे पिछड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश या बिहार पर केंद्रित किया। ऐसी स्थिति में जहां न्यूयॉर्क को शवों को फ्रीजर ट्रकों में छिपाकर रखना पड़ता है और उन्हें एक साल से अधिक समय तक छोड़ना पड़ता है, ग्रामीण उत्तर प्रदेश में प्रशासन को क्या करना चाहिए वे ये लिखने में व्यस्त थे । और यह तथ्य कि पश्चिमी मीडिया ने उन छवियों को पसंद किया, यह दर्शाता है कि वे दुनिया के सबसे बुरे लोग हैं। 

पश्चिमी उदारवादी मीडिया नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करता है। कम से कम उतना तो नहीं जितना वे नए "उदार" तालिबान से प्यार करते हैं, जिसने अब एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सभी का दिल जीत लिया है। लेकिन क्या वाकई पश्चिमी मीडिया को चिता जलाने पर ड्रोन उड़ाने की ज़रूरत थी? क्या 2019 का आम चुनाव जीतने के लिए पीएम मोदी से बदला लेने का कोई और तरीका नहीं था?

हमारे टीकाकरण कार्यक्रम का भी  पश्चिमी मीडिया के अभिजात वर्ग ने ना केवल उपहास किया बल्कि पूरी कोशिश की ,कि भारत में टीका बन ही ना पाए और इसके लिए हमे परेशान करने में कोई कताही नही की गई , सारा प्रयास अपनी वेक्सीन को बेचने का था और इसमें भारत का एक बड़ा तबका शामिल था । हां, शुरू करने में हमें कुछ दिक्कतें आईं, लेकिन अब हमें देखें। बिना किसी रोक-टोक के रोजाना 10 मिलियन से अधिक लोगों को नियमित रूप से टीकाकरण करना, प्रत्येक प्रमाणपत्र का अपना विशिष्ट पहचानकर्ता होता है, जिसे दिनांक और वैक्सीन बैच संख्या के साथ एक केंद्रीय डेटाबेस में दर्ज किया जाता है। कौन सा अन्य लोकतांत्रिक राष्ट्र इतनी दक्षता के साथ इतने बड़े पैमाने पर इस तरह का प्रबंधन कर सकता है? यह किसी भी राष्ट्र को गौरवान्वित करेगा। हेकलर्स को शर्म से छिपना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है, वे तनिक भी लज्जित नही है । उन्हें भारत की उपलब्धि पर गर्व ही नही होता ,वे हर बात को राजनीतिक चश्मे से ही देखना पसंद करते है।  

यह तकलीफ देता है। क्योंकि हम भारतीय कभी नहीं चाहते कि किसी अन्य देश या उसके लोगों के साथ बुरा हो। ऐसा नहीं है कि हम कैसे सोचते हैं कि वे हमारे दुख को क्यों दिखाएंगे? जब हम एक बेहतर कल की आशा करते हैं, तो हम सभी के लिए समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं। यह हमारी प्राचीन संस्कृत कहावतों में निहित भारतीय सोच है।

Saturday, June 5, 2021

Modi's Delhi Dream

Central Vista is the Indian prime minister’s dream, to bequeath the world’s largest democracy a capital that radiates native authenticity. The central vista precinct extends from the Rashtrapati Bhavan to India Gate. It includes the North Block, South Block, the Parliament building, and the central government secretariat buildings along Rajpath and all the way up to the India Gate circle, and all the plots of land immediately around it. 

According to the proposal, which does not have a detailed project report (DPR), a redevelopment of the central vista is intended to take place, which shall include construction of the new parliament building at the intersection of the triangle of the Red Cross Road and the Raisina Road. The plan includes the demolition of a few existing secretariat buildings like Shastri Bhavan and Rail Bhavan etc, as well as the National Museum, the Ministry of External Affairs building, Vice-President’s residence, and all other buildings along Rajpath with the now sole exception of the National Archives.

 

For more than five decades, the most mundane and exalted deliberations of Indian democracy were enacted within Parliament House’s annular walls of heavy sandstone, which house the Lok Sabha, the Rajya Sabha, and the majestically domed Central Hall ,where joint sessions of both houses are held on rare occasions and proclaimed the birth of modern India. 

 


In the summer of 2002, the then speaker of the Indian parliament, Manohar Joshi, became convinced that the building in which he worked, the circular Parliament House built by the British, was cursed. A string of Joshi’s senior colleagues had died in rapid succession over the preceding year. His predecessor as speaker of the Lok Sabha, was killed in a freak helicopter crash months before parliament convened that monsoon. The vice president of India, who chaired the Rajya Sabha, died when parliament was in session. And eight months before the vice president’s abrupt departure, more than half a dozen security personnel had lost their lives in a gun battle at the gates of Parliament House while thwarting armed militants backed by Pakistan from storming it. A massacre had been averted, but death and division continued to haunt and paralyse the corridors of power. Indian troops, awaiting orders on the border to punch into Pakistan, were weighed down by heavy casualties. In New Delhi, the business of government was juddering to a halt. Joshi, newly installed as speaker of the Lok Sabha by the Bharatiya Janata Party which led a fragile coalition of a dozen minor parties in government, decided to act. He summoned Ashwini Kumar Bansal, a lawyer and a specialist in Vastu — the ancient Indian discipline of architecture, akin to the Chinese Feng Shui — to survey Parliament House and recommend remedies to rescue India.

 Bansal, who has published 30 books on Vastu and Feng Shui, spent two days wandering the verandas and halls of the colonnaded camera contrived by Herbert Baker almost as an appendage to the stupendous acropolis conceived by Edwin Lutyens. Bansal experienced this during his inspection of the place. “It is the circular building,” he declared in a confidential memo to the speaker, “which ails the nation’s polity. To Bansal, it was an odd piece of architecture made according to the whims and fancies of a foreigner.  It evinced no fidelity to Hindu, Islamic, or Christian conventions of construction, and its round shape, evocative of zero and epitomising void and nothingness, endowed it with a mystical power to destroy anything that interacts with it”. Bansal, citing the sudden demise of a host of members of parliament and their children as evidence of the building’s ill-fated, ascribed the unnatural deaths of four Indian prime ministers to the flaws he detected in its configuration. He advised the speaker to vacate the building, convert it into a museum, and relocate parliament post-haste to a nearby convention center.

Bansal’s report, commissioned and reviewed in all seriousness, was never acted upon. Anxious that its contents might elicit hoots of derision from the left and the Anglophone liberal elites who viewed Vastu as pseudoscience, Joshi sat on it. When early elections were called two years later, the government was voted out of the office and so was Joshi. As a result, the idea of moving parliament appeared fated to fall by the wayside thereafter. But it was quietly mooted again in 2012 by the Congress Party, which adduced wear and tear and health and safety as the reasons for shifting out, and again it died in committee until Narendra Modi revitalized it. 

Unlike his forerunners, Modi was not constrained by the demands of allies. The triumph of the BJP under his leadership in the elections of 2014 shattered a 25-year spell of coalition governments. Modi was not merely a prime minister in the traditional sense but commended by his followers as nothing less than the father of what his admirers call “New India”. And so what had been a relatively minor yet contentious idea to renovate or relocate parliament blossomed under his supervision into a gargantuan vanity project to raise a new New Delhi with more than 20000 crores allocated for this venture.

 

New Delhi was born as the physical expression of imperial power. It was to be, in the words of Lord Hardinge, the Viceroy to India who became its most passionate advocate, “the assertion of an unfaltering determination to maintain British rule in India”. Calcutta, practically invented by the British and appointed the capital of India after the subcontinent was assimilated into the empire following the Mutiny of 1857, had outgrown its utility by the end of the nineteenth century. The British had unwittingly imported a modern nationalist consciousness to the Bengali natives who now clamored for concessions. Transferring the capital from the troubled eastern extreme to Delhi would not only strengthen British control. It would also enable Britain to cast itself as the legitimate successor to the great native dynasties that once ruled from the city. 

 No quarter was given to warnings that Delhi was the graveyard of empires and dynasties. And on 15 December 1911, against great opposition from the mercantile set that flourished in Calcutta, King George V, the only monarch to set foot in India, laid the foundation stones for New Delhi. Edwin Lutyens, selected as the principal architect, delegated lesser buildings to Herbert Baker. Each arrived in India with his own ideas. Hardinge attempted to impress his pre-eminence on the pair by reminding them that New Delhi “should be built in accordance with Indian sentiments”. “Who are we building for,” he asked, “the Indian or the British public?” 

Lutyens, with an impressive reputation and even more impressive connections — his father-in-law, Lord Lytton, had served as Viceroy in Bengal when Queen Victoria was proclaimed Empress of India was exasperated by such stipulations. He was not without reverence for India’s antiquity and wished to represent her amazing sense of the supernatural, with its complement to profound fatalism and enduring patience in his work. But his appreciation of India existed alongside a good measure of contempt for Indians. He ridiculed their architecture scorned the low intellect of the natives, declared it undesirable for Indians and whites to mix freely, and opined that mixed marriage is filthy and beastly.

Hardinge had dreamt of raising capital directly facing the walled city of Shahjahanabad , Old Delhi, now the mausoleum of Mughal rule. Such a creation might have forced racial and cultural intermixture. But the dread of disease, combined with a lack of space, prompted the construction to be moved to the relative wilderness of south Delhi, from where the central axis of the imperial capital radiated eastward. Its gaze, averted from the subjects whose awe it was intended to inspire, was directed instead at the vacant banks of the Yamuna river. Suggestions to scrap the project proliferated as it made its difficult progress. The eruption of the First World War only intensified opposition to the costly enterprise. But Lutyens, though he moved in and out of the country and undertook other projects, worked like a man possessed. Beginning at what is now India Gate, a prodigious classical arch conceptualised by Lutyens to commemorate soldiers who fell in the Great War, a broad processional way moved for two tree-lined miles west to Government House. This palace of rhubarb sandstone, built on 350 acres of flattened land on Raisina Hill to act as the official residence of the Viceroy, was a marvel of civilizational amalgamation. 

Lutyens dedicated every ounce of his intellect and soul to devising and perfecting it, from the 31 regal stairs that rise from its expansive forecourt to the 340 ornate rooms nestled in its four storeys to the 227 Tuscan columns whose capitals, doing away with coy Ionic volutes, were ornamented with bold Indian temple bells sculpted in stone. The lofty central dome, a fusion of the great Buddhist Stupa at Sanchi and the Pantheon of Rome, was laminated with copper and twice the height of the complex it crowned. The lavish 13-acre Mughal garden, laid out in quadrants divided by walkways and furbelowed with fountains, remains to this day an eden of geometric precision. 

 


Lutyens’s principal personal regret upon its completion was that he could no longer wander about it whenever I want to. It was not only the highest achievement of his career; it was also the greatest single material accomplishment of the British Raj. Robert Byron, the first critic to tour it, was far from exaggerating when he declaimed that it had no rival, ancient or modern. Mahatma Gandhi, affronted by its opulence, wanted it converted into a hospital but Republican India moved its president into it.

Government House was flanked on either side by the Secretariat buildings put up by Herbert Baker. Domed, red, and grafted with Indian motifs, they grew out of Baker’s ambition to “give architectural expression to a common dignity and distinction in the instrument of government as a united whole”. He had argued strenuously for the Secretariats to be sited on the same elevated plain Lutyens had earmarked exclusively for Government House. Lutyens pushed his building further back in return for assurances that Baker’s Secretariats would not obscure the view of his own masterwork. But that is what they did. 

A “colossal the artistic blunder has been made,” Lutyens told Baker in a furious letter after his attempts to force through alterations were rebuffed by London, “and future generations will, I am convinced, recognise this and condemn its perpetrator.” The vice-regal mansion envisaged as the axial point of the city became practically invisible. Only its dome remained discernible from the processional way. From this stupefying center extended a hexagonal maze of interminably long boulevards that intersected at enormous roundabouts. The Indian hierarchies of caste, perfectly complementing the British gradations of class, were co-opted almost unselfconsciously by Lutyens into the design of New Delhi. 

On either side of these roads, the public works department built bungalows with gardens that ranged, depending upon the rank of the occupant, from a few furlongs to several acres. The entire enterprise cost about £10 million. Willingly or not, Lutyens had imparted a strange segregationist stamp on the city’s topography. When it was inaugurated in 1931, the demographic of its airy interior was almost exclusively. Its periphery, rather than tapering away, intensified with Indian life.  But New Delhi in the end did more to fortify the native spirit than to fracture it. “Liberty does not descend upon a People,” Baker had inscribed in gold letters above the entrance to his Secretariats, “A People must raise themselves to Liberty.” By the time of the British arrival, India had become so accustomed to being conquered, so habituated to being trodden upon, so detached from its past, that, as V.S. Naipaul once wrote, anyone wishing to own an empire in the medieval world had only to stroll into India, where the natives were willing to “build anybody a new Delhi”.

 

India’s ancient architectural treasures, as the novelist Manu Joseph has observed, had been wiped out by waves of pre-colonial invasions, and what remained bespoke “the bravado of India’s conquerors”. It is only with the coming of the British, with all the attendant savagery and plunder, that India’s revival began. Indian nationalists denied this, but their movement could not have been possible in the absence of the intellectual stimulus supplied by the British presence. Mahatma Gandhi’s non-violent agitation for independence was the most elaborate compliment ever paid by an oppressed people to their oppressors. New Delhi consecrated Indian unity by granting India a definite center. Baker’s boast that the new capital united “for the first time through the centuries all races and religions of India” was not entirely empty. New Delhi drew India to it. There is no other seat of government in the world, with the possible exception of Washington, DC, that can rival it in scale or splendor. So extraordinary it seemed even to contemplate that, as Baker confided to Lutyens, it “would only be possible … under a despotism”. Its realisation, clarifying the conflict between the rhetoric and the conduct of Britain in India, quickened the demise of the Raj, almost every stage of the city’s advance coincided with a corresponding collapse of the crown’s authority. Britain, challenged by Indian nationalists in the language they had appropriated from the colonial power, withdrew from India within 16 years of New Delhi’s birth. 

 

Conceived in hubris and executed with the hand of despotism, New Delhi became the laboratory for history’s most audacious experiment in democracy after Britain’s exit. The city’s slow physical deterioration thereafter was accompanied by the loss of its prestige in the Indian consciousness as it became associated with, and indistinguishable from, the spectacularly corrupt Congress establishment presided over by the Nehru-Gandhi dynasty that ruled India for over half a century. 

Lutyens Delhi, once signifying all that was noble about republican India, metamorphosed gradually into a phrase that conjured up all its obscenities. It became, a metonym for moral decay. The politicians who decried it most vehemently were those who coveted it most passionately.  

Modi was propelled to power on a promise of draining Lutyens Delhi of the remnants of the Anglo-Indian encounter. He was the hope pg the multitudes who had been sneered at, marginalised, and subjected to cultural condescension and objectified for anthropological amusement by India’s preening caste of English-speaking elites who ran the country for most of its post-colonial existence. Modi saw himself as an agent of destiny, the first self-consciously Hindu leader in centuries to rule India from Delhi with an almost untrammeled authority. Last year, ignoring protests from conservationists, he invited bids for the remaking of New Delhi’s Central Vista. Half a dozen plans, crafted by firms flush with cash, were eventually shortlisted by the government. One architect proposed planting a star fashioned from glass multiple times the size of India Gate right behind it as a symbol of a rising India. The crowning jewel of another proposal was an iconic beacon again erected behind India Gate intended to serve as a new landmark for New Delhi. The lucrative redesign contract was handed to Bimal Patel, Modi’s fellow Gujarati and longstanding friend. 

 

Many anguished and Anya Malhotra, a translator, and Sohail Hashmi, a historian and documentary filmmaker, moved the HC to halt the ongoing Central Vista Avenue Redevelopment Project. They argued that the project was not an essential activity and therefore, could be put on hold in light of the pandemic. Petitioners’ counsel, senior advocate Siddharth Luthra, argued they were not seeking to overreach the Supreme Court’s January judgment that permitted the Central Vista, and that the plea to stop the construction was limited to the peak phase of the pandemic. The Centre said that the petition is an attempt to halt the project with oblique motives.

 

A bench of Delhi High Court of Chief Justice D.N. Patel and Justice Jyoti Singh passing order concluded that the Central Vista Project is an essential project of national importance and needs to be completed in a time-bound manner, and dismissed a Public Interest Litigation (PIL) seeking to put on hold the ongoing construction activity amidst the raging second wave of the pandemic and slapped a fine of Rs one lakh on the petitioners for filing what the court described as a “motivated petition” and not a “genuine one.”

All set, Patel’s plan is to build a new parliament, spired and triangular in shape and fit for a thousand occupants, opposite the existing structure; raze the administrative blocks that went up after 1947 and replace them with a series of secretariats of stone façade and glass-and-steel interior, big enough to accommodate a hundred thousand bureaucrats, on either side of the processional way from India Gate to Raisina Hill, and connect the buildings with an underground railway system. 

The existing parliament and secretariats will become museums. A new mansion for Prime Minister, not part of the original proposal approved by the government and inserted quietly after it had been signed off, will go up next to Lutyens’s presidential palace. Another building will be raised within its compound to house the vice president. “These new iconic structures,” the Modi regime says, “shall be a legacy for 150 to 200 years at the very least.”

Outside a very small circle, nobody knows what is going to be leveled and what will remain untouched. Modi’s decision in 2015 to withdraw Delhi’s application to Unesco to be included in the list of World Heritage Cities means that nothing, despite the government’s guarantees, is truly safe. What seems certain is that in the summer of 2022, when India turns 75, parliament will convene in a new building that will be a monument to Modi’s rule.

 

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